बड़े शहर के एक छोटे से कोने से...

बड़े शहर के एक छोटे से कोने से..."उसने कहा, मुंबई भारत का सबसे बड़ा शहर है, यहाँ सारी सुख सुविधाएँ हैं, है ना!"
"यह तो मैं भी जानताहूँ।""
पर एक बात तुम्हें गौर की?"
"क्या"
"मुंबई में पागलों की संख्या बहुत ज़्यादा है! ऐसा क्यों है भला?"
"...क्योंकि लोग यहाँ सपने लेकर आते हैं," मैंने कहा।
"अरे यार यह कोई बात है? इसका मतलब मुझे समझ में नहीं आया। क्या लोग सपनों को हकीक़त बनने के लिए भाग दौड़ करते करते पागल हो जाते हैं?"
"नहीं सपनों के टूटने पर लोग पागल हो जाते हैं," मैंने कहा।
फ़िर उसने कुछ नहीं पूछा


(यह उस आदमी के लिए लिख रहा हूँ, जिसे पहली बार तब देखा था जब मैं १०-१२ साल का था. उसका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक था। करीब बारह तेरह साल बाद वह आदमी एक बार फिर दिखा, उसके चेहरे का वह आकर्षण पता नही कहाँ खो गया था. वो मानसिक रूप से परेशां लग रहा था. कल ही एक दोस्त से यूँ ही उस आदमी के बारे में ज़िक्र छेडातो पता चला, की वो बहुत ही प्रतिभाशाली था. पर कई असफलताओं से बहुत हताश हो गया. आजकल उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं रहती है.)
उस आदमी के बारे में जो भी समझा लिख दिया...
भगवान से दुआ है की वह पहले जैसा हो जाए और अपने अधूरे सपनों को हकीकत बनाये...

2 comments:

shilpa sharma ने कहा…

mumbai ka ek rang ye bhee hai...jise dekhne se aksar log bachna chahte hain, jise tum bakhoobi sab ke saamne lane me poori tarah saphal rahe...keep it up!

jay ने कहा…

Good Very Good.ye india ke aam aadmi ki kahani hai

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