पुरानी डायरी के पन्ने
बेरोजगार मन-२
'मेरे हिस्से का काम'
हर सुबह ढूँढता हूँ उसे
अख़बारों के इश्तहारों में
दीवारों पर चिपका ना हो कहीं
इसलिए आते जाते
देखते रहता हूँ दीवारों पे
रास्ते के खम्बों को भी नहीं छोड़ता हूँ
बैठ ना गया हो कहीं
चढ़कर ऊपर इसीलिए
एक नज़र उन पर भी फेरता हूँ
गर छुपा हो कहीं पानी में
निकल आये बाहर वह
यही उम्मीद लिए
पानी में एक-एक पत्थर फेंकता हूँ
ताल का शांत जल, तरंगें खाता है
पर वह निरा बाहर न आता है
पता नहीं कैसा है वह
गोरा है या काला
ढूंढते हुए उसको
हस्तरेखाओं तक को खंगाला
वो वहां से भी फरार हो गया
हाथ में डिग्रियां लेकर ढूँढना उसे
बेकार हो गया
कहीं सुना
मिलता है वह दफ्तरों में
दफ्तरों की तरफ दौड़ा
मंदिरों को भी ना छोड़ा
बता ना पाए शिवजी
बता ना पाए राम
आखिर कहाँ खो गया है
मेरे हिस्से का काम
3 comments:
bhavnaye shabdo me ghul ke ekakaar ho gayee hain aur tumhari kavita jeevant ho uthi hai.... bahut khoob!
Dhanyavaad Shilpaji...
bahut badhia bayan karne ke liye alfaj nahi hain, padhkar dil garden garden ho gaya aur kuchh naya likho bhai
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