एक खामोश तकरार
एक खामोश तकरार
कल शाम कि बात
वहीं ठहरी रही...
हुई सुबह
दुपहरी गई
पर मैंने कुछ ना कहा
वो भी चुप रही...
मेरी निगाहें उस पर थीं
वो भी मुझे देख रही थी
बस पहल करने कि देर थी...
फिर वो भी मेरी तरह रोई
फूट फूट कर
क्योंकि वो मुझसे अब भी प्यार करती है...
मेरे दिल में भी सिर्फ उसी के लिए जगह है...
काश ये खामोश तकरार
कल शाम ही ख़त्म हो जाती...
(एक बहुत प्यारे से जोड़े के लिए)
2 comments:
Kaash takrar kal shaam Hi khatm ho jaati...
Bahut Khoobsoorat! Dil ko choonewaali kavita!!
takrar hona aam zindagi ka ek aham hissa hai, lekin koi bhi takrar bahut jaldi khatm honi chahiye to hi zindgi mein takrar ka maja hai
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