हम लोग

चुनाव के बाद दोस्त ने कहा 'हम लोग'
पता चला तुम्हें क्या चीज़ हैं हम लोग?
हम लोग ही तो हैं जो पहले को गिराकर
दूसरे को उठाते हैं
तुम्हारा क्या ख्याल है इस बारे में
अरे भाई हम लोग ही तो हैं
जो इन नेताओं को इनकी औकात बताते हैं
देखो किस तरह हम लोग शेर को भीगी बिल्ली बनाते हैं
हमने कहा तो क्या हुआ?
कल वे दहाड़ रहे थे
आज ये कर रहे हैं भोग
कल भी कठपुतलियां थे
और आज भी कठपुतलियाँ हैं हम लोग
अब ये जैसा चाहेंगे हमें नचायेंगे
 लालच का टुकड़ा फेंककर
हम लोगों को लड़ायेंगे
और जब हम लोग आपस में लड़ के मर जायेंगे
तब हमारी अधजली चिता पर ये लोग
अपनी राजनीति की रोटियां पकाएंगे
ये लोग हमारी चिता को अलाव बनाकर
अपनी हथेलियाँ गर्म करते रहेंगे
जब कोई हमारे बारे में पूछेगा
तब हमारी मौतों को दुखद घटना कहकर
ये लोग शर्म भी करते रहेंगे
पता नहीं...
किस बात की शर्म होगी वह
नफरत की चिंगारी भड़काने की शर्म?
दंगे करा कर हमें आपस में लड़ने की शर्म?
या फिर...
इसके बावजूद हमारे बच जाने की शर्म
जो भी हो
मानना पड़ेगा...
इन्हें शर्म तो आती है
और वहीँ दूसरी ओर हम लोग हैं
जो पिछली चोट को भुलाकर
अगली राष्ट्रीय शर्म का इंतजार करते हैं
शर्म के इन्ही ठेकेदारों की जयजयकार करते हैं
इससे बड़ी क्या शर्म होगी
कि हम लोगों को कभी शर्म ही नहीं आती है
इसीलिए सबकुछ जानने के बावजूद
यह जानकार पब्लिक ही मारी  जाती है!

1 comments:

shilpa sharma ने कहा…

kaash... ise padhkar hi log chet jaayen. per ab to netaon ko kisi bat pe bhi sharm nahi aati.

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