दो राही, एक सफर...
दो राही, एक सफर...
दोनों को याद है
कहाँ उनकी पहली मुलाकात हुई थी
नाम पूछने से शुरू उनकी बात हुई थी
पिछले कई सालों से उनका साथ है
फ़िर नाम भूल जायें एक दूजे का
क्या ऐसी भी कोई बात है?
भूले नहीं हैं
भूलना चाहते भी नहीं
ना दोस्ती है उनमें
ना दुश्मनी ही सही
फ़िर आख़िर क्या बात हो गई
एक अनमने रिश्ते की
कैसे शुरुआत हो गई?
दोनों ही अच्छे खासे हैं
बाल बच्चे वाले हैं
हां भाई कह रहा हूँ ना
दोनों एक ही दफ्तर में काम करनेवाले हैं
ऐसा भी नहीं है की
दूसरा वाला पहले से ज़्यादा कमाता है
पहले वाला भी दूसरे जितना ही पाता है
फ़िर दोनों एक दूजे से भय क्यों खाते हैं?
वक्त बेवक्त एक दूसरे को नीचा दिखाते हैं
रास्ता उनका किंचित एक है
फ़िर भी दोनों अकेले अकेले चले जा रहे हैं
रास्ते की भयावहता से जितना ना डरे
उससे कहीं ज़्यादा
दोनों एक दूसरे से डरते रहे
गिरते रहे, पड़ते रहे
चुपचाप दोनों चलते रहे
सुन न पाये थकावट की सरसराहट दूजा
इस कदर हर मकाम पर साँस भरते गए, भरते गए
बेवजह दोनों
एक दूसरे से डरते गए, डरते गए
...और रास्ता बीत गया
पता है... दोनों को मंजिल नहीं मिली
4 comments:
bahut accha hai sirji...
Likhte rahiye.Shubkamnayen.
achi rachna hai...
manzilen paane ke liye dosti karna aur nibhana bahoot zaroori hai...ye saar tumne bakhoobi samjha diya!!!!
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