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'बेरोजगार मन'
(वर्ष २००५ में लिखी कविता)
यह इंतज़ार कब ख़त्म होगा?
उस वक्त तो नहीं
जब भूल जाऊंगा कि किसका इंतज़ार कर रहा था
या उस वक्त
जब खबर ना रहेगी कि क्या कर रहा था?
हर इंतज़ार ख़त्म हो जाता है
कहीं ना कहीं जा कर
पर ये इंतज़ार कहता है मुस्कुराकर
थको नहीं जनाब
रुको नहीं जनाब
बस करते रहो यूँ ही
इंतज़ार इंतज़ार इंतज़ार
सुबह से शुरू इंतज़ार
दिन भर रहता है तैयार
दिन ढलने तक
रहता है ऐतबार
फिर ना जाने कब
धीरे-धीरे दस्तक दे देती है रात
रिमझिम-रिमझिम सी बरसात
भागता है वक्त
इंतज़ार के साथ
रात भी इंतज़ार में
कब बीत जाती है
समझ नहीं पाता हूँ
तकिये पर सिर रख
सुबह का इंतज़ार करते हुए
सपनों में खो जाता हूँ
इस इंतज़ार से यह उम्मीद जगती है
कि रात को देखे हुए सपने
अगली सुबह पूरे होंगे
पर, सुबह...
नई होती न कोई बात
हर बीतते पल के संग
टूटती उम्मीदें छोड़ जाती हैं पास
बस, इंतज़ार इंतज़ार इंतज़ार
मीलों तक पसरा हुआ
सरसों सा बिखरा हुआ
मन जिसे समेट नहीं पाता है
नौकरी का यह अंतहीन इंतज़ार
हर पल बेरोजगार होने का एहसास दिला जाता है...
1 comments:
कभी सुखद होता है तो कभी दुखद... जीवन है..
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